जिंदगी के इस सफर मे हमे न जाने कितने नए लोग मिलते है पर कुछ ही ऐसे होते है जो अपनी एक अलग पहचान छोड़ जाते है| कुछ ऐसा ही उस वक्त जब हम चित्तोड. के ऐतिहासिक किले का सफर कर नीचे लौट रहे थे बड़ी गहरी छाप छोड़ी उस ऑटो ड्राईवर ने जो हमे नीचे ला रहा था|
उनका वो शायराना अंदाज आज भी जब याद आता है तो चेहरे पर आज भी मुस्कान लौट आती है|
क्या सुना हमने जरा आप भी ....
चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला
बड़ा दिलकश, बड़ा रँगीन, है ये शहर कहते है-2
यहाँ पर हैं हज़ारों घर, घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर की गलियों का बंजारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...
मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ-2
न मुझसे बन सका छोटा सा घर, दिन रात रोता हूँ
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...
मेरे मालिक, मेरा दिल क्यूँ तड़पता है, सुलगता है-2
तेरी मर्ज़ी, तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल, किसी को तूने अंगारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा...
यही आग़ाज़ था मेरा, यही अंजाम होना था-2
मुझे बरबाद होना था, मुझे नाकाम होना था
मेरी तक़दीर ने मुझको, तक़दीर का मारा बना डाला
चमकते चाँद को टूटा.
आज बडी मुस्किल से उस कविता को आपके लिए ढूंढ पाया हूँ| अंदाज इतना बेहतरीन था कि ज्यादा कुछ तो याद न रख सके पर ऑटो के नंबर जरूर याद रह गए-1086
क्या शायराना अंदाज था उनका..........
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